सरसों की खेती करने का सही तरीका !!

सरसों की खेती (Sarso ki kheti) उत्तर भारत में, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे इलाकों में बहुत लोकप्रिय है। यह रबी फसल है और अच्छी पैदावार के लिए सही तरीके से बुवाई, खाद, सिंचाई और देखभाल जरूरी है। मैं आपको सरसों की खेती का पूरा तरीका और पानी (सिंचाई) के बारे में स्टेप बाय स्टेप बताता हूँ।


सरसों की खेती कैसे करें (Step by Step)

  1. उपयुक्त समय (बुवाई का समय)
    • उत्तर प्रदेश/उत्तर भारत में सबसे अच्छा समय: अक्टूबर के अंत से नवंबर के मध्य तक (5 नवंबर से 25 नवंबर सबसे आदर्श)।
    • देर से बुवाई (दिसंबर में) करने पर पैदावार कम हो सकती है।
  2. जमीन की तैयारी
    • खेत की 2-3 जुताई करें, अच्छी तरह समतल करें।
    • मिट्टी बलुई दोमट या दोमट होनी चाहिए, पानी का निकास अच्छा होना चाहिए (ज्यादा पानी खड़ा न हो)।
  3. बीज की मात्रा और बुवाई का तरीका
    • बीज दर: 4-5 किलो प्रति एकड़ (हाइब्रिड वैरायटी में 3-4 किलो भी काफी)।
    • पंक्ति से पंक्ति की दूरी: 30-45 सेमी, पौधे से पौधे: 10-15 सेमी।
    • तरीका: ड्रिल से बुवाई सबसे अच्छी, या छिड़काव विधि (broadcast) भी कर सकते हैं।
  4. उपयुक्त वैरायटी
    • अच्छी पैदावार वाली: NRCHB 101, पायनियर, महाकोष, पूसा अग्रणी, वारुणा, आरएलएम 619 आदि।
    • हाइब्रिड वैरायटी ज्यादा तेल और पैदावार देती हैं।
  5. खाद और उर्वरक
    • बुवाई के समय: SSP 100-150 किलो + यूरिया 20-25 किलो + MOP 20-25 किलो + जिंक सल्फेट 10 किलो प्रति एकड़।
    • पहली सिंचाई के साथ: यूरिया 20-25 किलो अतिरिक्त।
    • सल्फर बहुत जरूरी है (तेल बढ़ाने के लिए) — सल्फर युक्त खाद या सल्फर स्प्रे करें।
  6. कीट और रोग नियंत्रण
    • चेपा (aphid) सबसे बड़ा कीट — नीम आधारित या रसायन स्प्रे करें।
    • सफेद चकत्ता, अल्टरनेरिया — सही समय पर फफूंदनाशक।
  7. कटाई
    • 110-140 दिन में फसल तैयार (फलियाँ पीली पड़ जाएँ तो)।
    • अच्छी पैदावार: 12-18 क्विंटल प्रति एकड़ (हाइब्रिड में 20+ भी संभव)।

सरसों में कितनी बार और कब पानी (सिंचाई) लगाते हैं?

सरसों को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन सही समय पर सिंचाई से पैदावार बहुत बढ़ जाती है। सामान्यतः 2 से 5 बार सिंचाई होती है (मिट्टी, मौसम और पानी की उपलब्धता पर निर्भर)।

  • सामान्य सलाह (उत्तर प्रदेश/उत्तर भारत के लिए सबसे आम):
    • कुल 2-3 सिंचाई काफी होती है।
    • पहली सिंचाई: बुवाई के 30-35 दिन बाद (शाखा बनने/रोसेट स्टेज पर) — कई जगह 25-30 दिन पर भी।
    • दूसरी सिंचाई: 60-75 दिन बाद (फूल आने या फली बनने के समय) — सबसे महत्वपूर्ण, इससे पैदावार बढ़ती है।
    • तीसरी (जरूरत पड़ने पर): 90-100 दिन बाद अगर सूखा हो।
  • अगर पानी उपलब्ध हो तो 4-5 बार (कुछ क्षेत्रों में):
    • पहली: बुवाई के समय या 7-10 दिन बाद (हल्की)।
    • दूसरी: 25-30 दिन बाद।
    • तीसरी: 45-50 दिन बाद (फूल आने पर)।
    • चौथी: 70-80 दिन बाद (फली बनते समय)।
    • पांचवीं: अगर बहुत सूखा हो।

ध्यान रखें:

  • सिंचाई हल्की रखें, खेत में पानी ज्यादा खड़ा न होने दें (जड़ सड़न हो सकती है)।
  • मिट्टी चेक करें — पौधे मुरझाए दिखें तो पानी दें।
  • बारिश वाली जगहों में कभी-कभी सिर्फ 1-2 सिंचाई भी काफी।
  • ड्रिप या छिड़काव से पानी बचता है और फसल बेहतर होती है।

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